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Thursday, 10 April 2014

स्टंटवादी पार्टी !


अगर आपको याद हो तो जया बच्चन जी  17 दिसम्बर 2012 को निरभया पर हुए बलात्कार पर संसद मे   रो पड़ी थी  ये समाजवादी पार्टी की सांसद है अगर उनके वह आँसू असली थे तो आज ही इस  पार्टी को छोड़ दे |


  समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह ने चुनावी मौसम में बलात्कार पर अजीब बयान देकर विवाद पैदा कर दिया है। मुरादाबाद की रैली में आज मुलायम ने रेप पर फांसी की सजा का विरोध किया। मुलायम ने कहा कि क्या रेप करने की सजा फांसी होगी?
मुलायम ने कहा कि "लड़कों से गलती हो जाती है। मेरी सरकार आएगी तो ऐसे कानून को बदलेगी। मुलायम सिंह यादव ने वादा किया कि वह सत्ता में आए तो ऐसा कानून हटाएंगे जो बलात्कारियों को फांसी की सजा देता है। उन्होंने कहा कि रेप में फांसी की सजा सही नहीं है। हम ऐसा कानून बनाएंगे जो बलात्कारियों को भी सजा दे और झूठी शिकायत करने वालों को भी।"


 ये पार्टी वाले दिमाग से पैदल तो नहीं हो गए है?  कल आज़म खान ने भारतीय सेना को बाटने का काम किया था आज ये "महान" (कहना उचित नहीं होगा )  नेता फिजूल का बयान देकर चुनाव जीतना चाहता हैं !  अरे ऐसा व्यक्ति  प्रधानमंत्री अगर बन गया  तो देश मे हर रोज़ बलात्कार , हत्या , छेड़-छाड़ जैसी वारदाते होती रहेंगी समाजवादी पार्टी मुझे नहीं लगता कहीं से भी समाज के हित मे काम करती नज़र आती है ! मुजजफ्फर  नगर दंगो मे आज भी पीड़ित परेशान है उनकी तरफ किसी की नज़र नहीं जाती वोट बैंक की राजनीति के लिए कितना अपना स्तर गिराओगे ? सुधार जाओ नहीं तो जनता माफ नहीं करेगी !  

Sunday, 23 March 2014

अमर शहीद भगत सिंह !

 मैं आज एक फिल्म देख रहा था जो भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरु जी एवं अन्य क्रांतिकारियों के जीवन पर आधारित थी  | क्योंकि कल 23 मार्च है इनकी पुण्यतिथि |  हम भारतियो की एक खासियत है जब –जब किसी क्रांतिकारी की जन्म तिथि या पुण्यतिथि होती है तब ही हम उन्हे याद करते है | खेर हम कम से कम उन्हे याद तो करते है मैं तो कुछ बुज़ुर्गों द्वारा अब ये सुनता हूँ की आने वाले कल मे हम शायद ही इन्हे याद करे ! इस आधुनिक भरी दुनिया में  इस फिल्म को  देख एक अलग सा एहसास होने  लगता है | मैंने जाना अगर गांधी जी  चाहते तो भगत सिंह को  बचा सकते थे पर नहीं बचा सके और इतिहास आज भी ये सवाल करता  है की उन्होने इन तीनों क्रांतिकारियों को बचाने मे मदद क्यों नहीं की ?  जो सपना उन्होने देखा था वो पूरा तो हुआ पर अगर वो उस समय ज़िंदा होते तो शायद हम आज़ाद जल्दी हो सकते थे | उनका मकसद था आज़ादी और काँग्रेस भी आज़ादी ही चाहती थी पर दोनों के तरीके अलग थे | काँग्रेस का काम सिर्फ सत्ता हथियाना था चाहे आज़ादी के बाद कौन  किस स्थिति मे है कोई परवाह नहीं और शायद आज भी यही हालत है| भारत को आज़ाद हुए 60 बरस से ऊपर हुए पर उनकी ये बात आज भी सटीक बैठती है |
भगत सिंह जी ने कहा था :-

“आज़ादी हमारा मकसद नहीं है , सिर्फ आज़ादी हमारा मकसद नहीं है , आज़ादी का मतलब क्या है ?  की हुकूमत  अंग्रेज़ों के हाथो से निकल कर मुट्ठी भर रईस ओर ताकतवर हिंदुस्तानियों के हाथो मे चले जाये क्या यहीं आज़ादी है ? इससे आम इंसान की ज़िंदगी मे कोई फर्क आएगा? क्या मज़दूर ओर किसान वर्ग के हालात बदलेंगे ? उन्हे उनका सही हक मिलेगा ? नहीं, आज़ादी सिर्फ पहला कदम है मकसद है वतन बनाना एक ऐसा वतन जहाँ हर तबके के लोगो को बराबरी से जीने का हक मिले , जहाँ मजहब के नाम पर समाज मे बटवारा न हो |
एक ऐसा वतन   जो इंसान का इंसान पर ज़ुल्म बर्दाश्त न करे | मुश्किल है पर असंभव नहीं , हिंदुस्तान जहा इतने सारे धर्म ,जातियाँ, भाषाए ,कल्चर है उसे एक साथ जोड़े रखना आसान नहीं लेकिन हम इस बात को आज नहीं समझेंगे  और इस मसले को लेकर संघर्ष नहीं करेंगे तो हिंदुस्तान कल एक आज़ाद मुल्क तो होगा पर एक भ्रष्ट, शोषक और सांप्रदायिक समाज बनकर रह जाएगा |
हम सबको मिलकर बनाना है एक समाजवादी वतन”  

आप ये पड़कर सोच रहे होंगे की इनमे जो बाते भगत सिंह जी ने काही शत प्रतिशत सही है पर ये सच मैं भी जानता हूँ और आप भी पर हम हाथ पर हाथ धरे बैठे सोचते रह जाते है |

मुझे डर हैं कहीं आगे चलकर आने वाली पीढ़ी से पूछे तो वो अजय देवगन , बॉबी देओल, या सनी देओल याद न रखे उन्हे पता होना चाहिए की असली आज़ादी के हीरो वो थे जो फाँसी के तख्ते पर चड़ गए !

मेरा आपसे बस एक निवेदन है आप कुछ कर सके न सके पर जब जहाँ काही किसी को भी  गलत कार्य करते हुए जैसे भ्रष्टाचार ,  देश से गद्दारी तो ऐसा होने से रोके | अगर आप मिलकर इस देश की मिट्टी से प्यार करते है और जिन क्रांतिकारियों को आदर्श मानते है तो हम 60% युवा देश को विश्व मे तिरंगे की तरह नाम ऊँचा रख सकेंगे |
जय हिन्द ! जय भारत !

- देवेंद्र गोरे

Thursday, 16 January 2014

शिकायत का अधिकार!

हो सकता है कि आपको शीर्षक थोडा अटपटा लगे । शिकायत करने का अधिकार? ये अधिकार तो व्यवस्था ने, हमारे संविधान ने हमें दिया ही हुआ है ना!

कौन होगा इस देश में जिसने आज तक कभी शिकायत न की हो! पुलिस के अत्याचारों और मनमानी के खिलाफ, दफ़तर में रिश्वत की बाट जोह रहे 'बाबू' के फ़ाइल आगे बढ़ाने में आनाकानी के खिलाफ, टूटी सड़कों, घर के बाजू में लगे कूड़े के ढेर और बहती नालियों के खिलाफ, अधिकारियों के बात न सुनने के खिलाफ, ठेकेदारों के सरकार द्वारा तय दरों से ज्यादा वसूलने के खिलाफ; हम सब शिकायत करते ही तो रहते हैं यार! फिर इसमें नया क्या है?

बात तो आप भी सही ही बोल रहे हो । पर मेरे अगले सवाल से आप के मन में चल रहे विचारों की बयार का रुख बदलना चाहिए । हमारी की गयी शिकायतों का कितने प्रतिशत अपने अंजाम तक पहुँचता है? कुछ बुद्धिजीवी वर्त्तमान व्यवस्था में आस्था प्रकट करते हुए रिश्वत का 'शॉर्टकट' अपनाकर अपना काम निकाल ले जाते होंगे, कुछ ऊंची पहुँच का फायदा उठाते हुए 'ऊपर' से फ़ोन करवा देते हैं । और बाकी? सहमत हैं क्या?

यहाँ बात 'छोटे' स्तर पर फैली अव्यवस्था और भृष्टाचार की है । आम आदमी तो सार्वजनिक दफ्तरों के काम-काज के तौर तरीकों और बात बात पर उनकी जेब टटोले जाने से ही सबसे ज्यादा बेहाल है । बड़े भृष्टाचार की बड़ी बड़ी बातें बड़े बड़े लोग जाने, बड़ी बड़ी सरकारें जाने!

दरअसल रिश्वत को आत्मसात कर चुके जमाने ने अगर अपनी आँखें बंद करके दिल पर भारी पत्थर रख लिया है तो इसकी एकमात्र वजह यही जर्जर हो चुकी व्यवस्था है जिसमें एक छोटे बाबू से लेकर लाल नीली बत्तियों में चलने वाले साहब जनाबों तक को सिर्फ 'ऊपर' जवाब देना पड़ता है; नीचे नहीं! और इस 'सांप सीढ़ी' रुपी व्यवस्था में सबसे नीचे वाले खाने में रखा है 'आम आदमी'! उसकी कौन सुनेगा? ऊपर तक पहुंचे कैसे? इतने सांप जो रास्ते में खड़े हैं ।

Wednesday, 16 October 2013

फिल्म समीक्षा :- “वार छोड़ न यार”

3***/5
फिल्म में सोहा अली खान, शरमन जोशी, जावेद जाफरी और मुकूल देव मुख्य भूमिक में हैं। फिल्म में सोहा अली खान एक पत्रकार की भूमिका निभा रहीं हैं। जो भारत-पाक का युद्ध कवर करने जाती है। फिल्म में शरमन जोशी एक भारतीय सिपाही की भूमिका में है, तो वहीं दूसरी तरफ जावेद जाफरी पाकिस्तानी सिपाही हैं।

भारत और पाकिस्तान के बीच के रिश्ते को लेकर तो कई फिल्में बनी हैं, लेकिन दोनों देश के बीच जंग पर बहुत कम फिल्में ही बनी हैं।  राइटर डायरेक्टर फराज हैदर ह्यूमर का बखूबी इस्तेमाल करते हुए अपना पक्ष रखते हैं कि कैसे चीन और अमेरिका भारत-पाक तनाव को बढ़ावा देकर अपना फायदा करना चाहते हैं। वो दोनों तरफ की सरकारों की अपनी अपनी सेना के प्रति लापरवाही दिखाते हैं। इसमें एक जोक भी है जैसे पाकिस्तानी जवानों का दाल में गोश्त ढूंढना। nuclear bomb की जगह NEWCLEAR bomb जो चीन द्वारा पाकिस्तान को दिया गया | जावेद जाफरी का अभिनय दमदार है उनका फिल्म के हर डाइलॉग में  बहुत गहराई से व्यंग छुपा  है | फिल्म का मजेदार हिस्सा अंताक्षरी जो दो मुल्को के बीच मे खेला जाता है जिसमे एक  दूसरे के देश के गाने गाते है| फिल्म में अफ़ग़ानिस्तान के घुसपेटियों ने भी अपनी छाप छोड़ने मे कसर नहीं छोड़ी |  दिलीप ताहिल चार अलग-अलग किरदारों में फिल्म में कुछ हंसी देते हैं। वो एक भ्रष्ट भारतीय मंत्री हैं, एक पाकिस्तानी नेता हैं, अमेरिकी सीनेटर हैं और चीनी जनरल हैं जिन्हें पहचानना थोड़ा मुश्किल है। संजय मिश्रा पाकिस्तानी कमांडर के तौर पर बेहद अच्छे लगते हैं। ‘वार छोड़ न यार’ एक गंभीर विषय को हल्के-फुल्के तरीके से दिखाने में कामयाब होती है। फिल्म में आर्मी अफसर और रिपोर्टर के बीच का जबर्दस्ती का रोमांटिक ट्रैक भी दिखाया गया है जिसकी जरूरत नहीं है।

मैं इस फिल्म को 4 स्टार दे सकता था अगर हेरोइन सोहा नहीं होती तो पर पर 3 स्टार और एक बार देखना ज़रूर बनाता  है !  

Tuesday, 3 September 2013

फिल्म समीक्षा – सत्याग्रह


***/5
“उठकर करने है कुछ काम
रघुपति राघव राजा राम”


राजनीति पर आधारित फिल्म बनाने वाले प्रकाश झा जनता को आकर्षित करने मे सफल तो हुए है पर फिल्म मे “गंगाजल” “राजनीति” जैसी पकड़ नहीं दिखी| इसमे कोई दो राय नहीं की यह फिल्म अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के आंदोलन पर आधारित है और दर्शको को वही दिखा कर आकर्षित  किया है |


लेकिन फिल्म को देखने के बाद कहीं ना कहीं ऐसा महसूस हुआ कि फिल्म को बनाते समय अन्ना हजारे मूवमेंट कहीं ना कहीं फिल्म निर्माताओं की सोच मे था लेकिन बाद में फिल्म बनाते हुए उन्होंने ये सोचकर कि कहीं कुछ ज्यादा बवाल ना हो जाए फिल्म में काफी बदलाव करने की कोशिश की। लेकिन फिर भी अरविंद केजरीवाल और साथ ही अन्ना की मौजूदगी कहीं ना कहीं हीं जरुर महसूस हो रही थी। जहां तक बात  है फिल्म के सफल होने की तो सत्याग्रह कहीं ना कहीं थोड़ी बोर जरुर लगी है और फिल्म कुछ भी ऐसा नहीं है जो कि यंग जेनरेशन के खून को खौला देगा या उनमें बदलाव की चिंगारी पैदा कर देगा। फिल्म मे social नेटवर्किंग का इस्तेमाल काफी अच्छी तरह से किया गया है जो आज की युवा पीड़ी मे काफी प्रसिद्ध है |

फिल्म का संगीत साधारण है. बस एक गीत रघुपति राघव राजा राम फिल्म के अंदर अच्छा लगता है|

फिल्म की कहानी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई से जुड़ी हुई है। रिटायर अध्यापक द्वारका आनंद (अमिताभ बच्चन) ऐसे व्यक्ति हैं जो देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराना चाहते है। वह अपने सिद्धांतों पर चलते है। मानव राघवेंद्र (अजय देवगन) दिल्ली में अपना व्यापार चलाता है और इसके लिए कुछ भी कर सकता है। मंत्री बलराम सिंह (मनोज वाजपेयी) सत्ता और सत्ता हथियाना चाहता है। राजवंशी सिंह (अर्जुन रामपाल) सड़कों की राजनीति करने में व्यस्त हैं। यास्मीन (करीना कपूर) एक खोजी पत्रकार का जिसका मकसद लोगों तक सच पहुंचाना है। एक दिन अचानक एक दुर्घटना में द्वारका के बेटे अखिलेश की मौत हो जाती है। मंत्री बलराम अखिलेश की पत्नी अमृता सिंह को मुआवजा देने की घोषणा करता है लेकिन जब उसे अखिलेश की मौत के 3 माह बाद भी मुआवजा नहीं मिलता है तो वह कलेक्टर ऑफिस पहुंचती है। यहीं से शुरू होती है भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग। इस फिल्म से प्रकाश झा ने राजनीति और गंगाजल बनाई जो बॉक्स ऑफिस पर हिट रही।

पर मुझे लगता है सत्याग्रह देखने के बाद की “सत्याग्रह कल भी जरूरी था और आज भी जरूरी है” !


देवेंद्र गोरे